हमें और जीने की चाहत ना होती
अगर तुम ना होते....!!
संगमरमरी बाहे उसकी
तन फूलो की ड़ाल !
नैन उसके जादू भरे
मुख चाँदी की थाल !
कुंदन जैसे ओंठ रसिले
रेशम जैसे बाल !
चंदा-सूरज छुप जाय
देख क़े गोरे गाल !
उसके दर्प की माया से
आँखे है लालो-लाल !
बहती नदिया को शर्माए
मस्त पवन की चाल !
सुंदर सुंदर गीत मिलन क़े
मधुर -मधुर सुरताल !
वसंत पग पग नाचे
मौसम खेले हाल !
वह मेरे ज्ञान की देवी
मै उसका महिपाल !
क्या पूछा-
क्या करता है ये बंदा
कुछ मत पूछो,
अच्छा नहीं ये धंदा !
कई लोगो ने मिलकर
कर दिया इसे गन्दा !
चल रहा है आजकल
बहुत ही मंदा !
बच्चा था, जब
तब माँगा करता था चंदा !
जवानी में पिता की आशाओ
पर फिर कर रंदा
बंदा, आज भी
माँगा करता है चंदा !
मनुष्य को सुख
कैसे मिलेगा.....?
नेता ने कहा-
मशीन बैठाओ
वस्तुओ की कमी है
उत्पादन बढाओ
उपकरणों की ताकत बढाओ
धन की वृद्दि करो !
फकीर ने कहा-
बाहर नहीं ; भीतर देखो
दूर करो,
मन से हिंसा को
क्रोध और द्वयेश को
मत सोचो-
आराम की बात
मिथ्या की बात
सोचो-
प्रेम की बात
आत्मतोषण की बात
और अंत में
फकीर को गोली
मार दी गयी !
नेता.......!!!
पियूष उघडे हुए माता
दूध पिलाती जाती है .....
लेकिन
किस आशा पर ;
यही, न कि
बेटा अंतिम समय
अवश्य पिलाएगा
दो बूँद
पानी क़े......!!
नमस्कार ओ रवि....
तू कौन ?
मै एक कवि !
मै वहा पहुच जाता हूँ
जहा तुम नहीं पहुच पाते हो !
उसने कहा -
क्यों अपने आप को को बहलाते हो !
व्यर्थ ही ख्वाबी महल बनाते हो !
अरे, तेरी तो गन्दगी में
जीने की आदत है !
शराफत तुझमे नदारत है !
तू तो है एक निरीह प्राणी !
मेरे सामने तेरी क्या सानी !
अरे जा - कहा राजा भोज
कहा गंगू तेली !
मत कर मुझसे अठखेली !
किस मूर्ख ने कहा है कि..
जहा न पहुचे रवि
वहा पहुचे कवि
अरे मैंने उसे चाय नहीं पिलाई थी !
थोड़ी सी भाँग मांग रहा था ,
वह भी नहीं खिलाई थी !
तूने उसे चाय पिलाई होगी
भाँग भी खिलाई होगी
भाँग क़े नशे में वह
कह गया होगा !
किन्तु मेरा दावा है ...
आज अपने आप पर रो रहा होगा !